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Thursday, 22 December 2016

मौर्य वंश , Maurya Empire

मौर्य राजवंश (३२२-१८५ ईसापूर्व) प्राचीन भारत का एक शक्तिशाली एवं महान राजवंश था। इसने १३७ वर्ष भारत में राज्य किया। ईसा पूर्व 326 में सिकन्दर की सेनाएँ पंजाब के विभिन्न राज्यों में विध्वंसक युद्धों में व्यस्त थीं। मध्यप्रदेश और बिहार में नंद वंश का राजा धननंद शासन कर रहा था। सिकन्दर के आक्रमण से देश के लिए संकट पैदा हो गया था। धननंद का सौभाग्य था कि वह इस आक्रमण से बच गया। यह कहना कठिन है कि देश की रक्षा का मौक़ा पड़ने पर नंद सम्राट यूनानियों को पीछे हटाने में समर्थ होता या नहीं। मगध के शासक के पास विशाल सेना अवश्य थी किन्तु जनता का सहयोग उसे प्राप्त नहीं था। प्रजा उसके अत्याचारों से पीड़ित थी। मौर्या वंश स्थापना का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य और उसके मन्त्री कौटिल्य को दिया जाता है, जिन्होंने नन्द वंश के सम्राट घनानन्द को पराजित किया। मौर्य साम्राज्य के विस्तार एवं उसे शक्तिशाली बनाने का श्रेय सम्राट अशोक जाता है।

शासकों की सूची

  1. चन्द्रगुप्त मौर्य 322 ईसा पूर्व- 298 ईसा पूर्व
  2. बिन्दुसार 297 ईसा पूर्व -272 ईसा पूर्व
  3. अशोक 273 ईसा पूर्व -232 ईसा पूर्व
  4. दशरथ मौर्य 232 ईसा पूर्व- 224 ईसा पूर्व
  5. सम्प्रति 224 ईसा पूर्व- 215 ईसा पूर्व
  6. शालिसुक 215 ईसा पूर्व- 202 ईसा पूर्व
  7. देववर्मन् 202 ईसा पूर्व -195 ईसा पूर्व
  8. शतधन्वन् मौर्य 195 ईसा पूर्व 187 ईसा पूर्व
  9. बृहद्रथ मौर्य 187 ईसा पूर्व- 185 ईसा पूर्व
पुराणों के अनुसार अशोक के बाद कुणाल गद्दी पर बैठा। अशोक के और भी पुत्र थे। राजतरंगिणी के अनुसार जलौक कश्मीर का स्वतंत्र शासक बन गया। तारनाथ के अनुसार वीरसेन अशोक का पुत्र था, जो गांधार का स्वतंत्र शासक बन गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि अशोक की मृत्यु के बाद ही साम्राज्य का विघटन हो गया।अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, इस धर्म के उपदेशों को न केवल देश में वरन विदेशों में भी प्रचारित करने के लिए प्रभावशाली क़दम उठाए। अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को अशोक ने इसी कार्य के लिए श्रीलंका भेजा था।अशोक के बाद ही मौर्य साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया था और लगभग 50 वर्ष के अन्दर इस साम्राज्य का अंत हो गया। मौर्य साम्राज्य की सामाजिक आर्थिक, शासन प्रबंन्ध तथा धर्म और कला सम्बन्धी जानकारी के लिए कौटिल्य का अर्थशास्त्र, मैगस्थनीज़ कृत इंडिका तथा अशोक के अभिलेखों का ठीक से अर्थ लगाया जाए तो पता चलेगा कि वे एक दूसरे के पूरक हैं।चन्द्रगुप्त ने सिकन्दर (अलेक्ज़ेन्डर) के सेनापति सेल्यूकस को ३०५ ईसापूर्व के आसपास हराया था। ग्रीक विवरण इस विजय का उल्ले़ख नहीं करते हैं पर इतना कहते हैं कि चन्द्रगुप्त (यूनानी स्रोतों में सैंड्रोकोटस नाम से ) और सेल्यूकस के बीच एक संधि हुई थी जिसके अनुसार सेल्यूकस ने कंधार , काबुल, हेरात और बलूचिस्तान के प्रदेश चन्द्रगुप्त को दे दिए थे। इसके साथ ही चन्द्रगुप्त ने उसे ५०० हाथी भेंट किए थे। चन्द्रगुप्त ने या उसके पुत्र बिंदुसार ने सेल्यूकस की बेटी से वैवाहिक संबंध स्थापित किया थासेल्यूकस ने मेगास्थनीज़ को चन्द्रगुप्त के दरबार में राजदूत के रूप में भेजा था। अशोक के शिलालेख कर्नाटक में चित्तलदुर्ग, येरागुडी तथा मास्की में पाए गए हैं। चन्द्रगुप्त के बाद उसका पुत्र बिंदुसार सत्तारूढ़ हुआ पर उसके बारे में अधिक ज्ञात नहीं है।

चक्रवर्ती सम्राट अशोक

सम्राट अशोक, भारत के ही नहीं बल्कि विश्व के इतिहास के सबसे महान शासकों में से एक हैं। । अपने राजकुमार के दिनों में उन्होंने उज्जैन तथा तक्षशिला के विद्रोहों को दबा दिया था। पर कलिंग की लड़ाई उनके जीवन में एक निर्णायक मोड़ साबित हुई और उनका मन युद्ध में हुए नरसंहार से ग्लानि से भर गया। उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया तथा उसके प्रचार के लिए बहूत कार्य किये। सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म मे उपगुप्त ने दीक्षित किया था। उन्होंने देवानांप्रिय, प्रियदर्शी, जैसी उपाधि धारण की। सम्राट अशोक के शिलालेख तथा शिलोत्कीर्ण उपदेश भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह पाए गए हैं। उसने धम्म का प्रचार करने के लिए विदेशों में भी अपने प्रचारक भेजे। जिन-जिन देशों में प्रचारक भेजे गए उनमें सीरिया तथा पश्चिम एशिया का एंटियोकस थियोस, मिस्र का टोलेमी फिलाडेलस, मकदूनिया का एंटीगोनस गोनातस, साईरीन का मेगास तथा एपाईरस का एलैक्जैंडर शामिल थे।३२२ ई. पू. में चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरू चाणक्य की सहायता से धनानन्द की हत्या कर मौर्य वंश की नींव डाली थी। २९८ ई. पू. में सलेखना उपवास द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना शरीर त्याग दिया।अशोक (२७३ ई. पू. से २३६ ई. पू.)- राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष लगे। इस कारण राज्यारोहण चार साल बाद २६९ ई. पू. में हुआ था।वह २७३ ई. पू. में सिंहासन पर बैठा। अभिलेखों में उसे देवाना प्रिय एवं राजा आदि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है। मास्की तथा गर्जरा के लेखों में उसका नाम अशोक तथा पुराणों में उसे अशोक वर्धन कहा गया है। सिंहली अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने ९९ भाइयों की हत्या करके राजसिंहासन प्राप्त किया था, लेकिन इस उत्तराधिकार के लिए कोई स्वतंत्र प्रमाण प्राप्त नहीं हुआ है।

Wednesday, 21 December 2016

शिमला समझौता 2 जुलाई 1972, Shimla Agreement

शिमला समझौता 2 जुलाई 1972, Shimla Agreement

1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच एक बड़ा युद्ध लड़ा जा चुका था, 93 हजार पाकिस्तानी फौजी भारत में युद्धबंदी थे और पाकिस्तान से टूट कर पूर्वी पाकिस्तान भी बंगलादेश बन गया था।विश्वास बहाली और कड़वाहट को कम करने के मकसद से इंदिरा और भुट्टो ने एक मंच पर आने का फैसला किया।भारत-पाकिस्तान के बीच शिखर-वार्ता 28 जून से 1 जुलाई तक तय की गयी। चार दिन तक चलने वाली इस वार्ता में सात दौर की वार्ता होनी थी। 28 जून को ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ वार्ता के लिए शिमला पहुंचे।पाकिस्तान द्वारा बंगलादेश को मान्यता, भारत-पाकिस्तान के राजनयिक संबंध, व्यापार, कश्मीर में नियंत्रण रेखा स्थापित करना और युद्धबंदियों की रिहाई जैसे मुद्दों पर बातचीत चलती रही। लेकिन कुछ मुद्दों पर एक राय नहीं बन पा रही थी। दोनों देशों के प्रतिनिधी और पत्रकार किसी समझौते की उम्मीद छोड़ चुके थे लेकिन अगले दिन फिर 2 जुलाई को दोनों पक्षों में बातचीत हुई। आखिरकार 2 और 3 जुलाई की रात 12 बजकर 40 मिनट पर दोनों देशों ने समझौता पर हस्ताक्षर कर दिए। शिमला समझौते में दोनों देशों ने महत्वपूर्ण बातों पर सहमति जाहिर की थी। इस समझौते में भारत-पाकिस्तान ने तय किया कि 17 दिसम्बर 1971 को पाकिस्तानी सेनाओं के आत्मसमर्पण के बाद दोनों देशों की सेनायें जिस स्थिति में थीं, उस रेखा को ”वास्तविक नियंत्रण रेखा“ माना जाएगा और कोई भी पक्ष अपनी ओर से इस रेखा को बदलने या उसका उल्लंघन करने की कोशिश नहीं करेगा। शिमला समझौते के बाद नियंत्रण रेखा को बहाल किया गया। लेकिन पाकिस्तान अपने इस वाएदे को कभी नहीं पूरा किया। शिमला में हुए समझौते के बाद भारत ने 93 हजार पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया और पाकिस्तानी जमीन भी वापस कर दी | भारत में शिमला समझौते का विरोध किया जा रहा था। बंगबंधु की नेतृत्व में बांग्लादेश की आजादी की मांग उठने लगी। राष्ट्रपति याह्या खान ने आंदोलन को कुचलने के लिए 25 मार्च 1971 को सैनिक कार्रवाई के आदेश दे दिए। सैनिक कार्रवाई में करीब 3 लाख बांग्लादेशी मारे गए। कई महीने तक चलने वाली राजनीतिक-स्तर की बातचीत के बाद 3 जुलाई 1972 में शिमला में भारत-पाकिस्तान शिखर बैठक हुई। शिमला समझौते के तहत एक समझौते पर इंदिरा गाधी और जुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए थे।

Tuesday, 20 December 2016

मुग़ल शासक , Mughal Periods

मुग़ल शासक , Mughal Periods

नाम
जन्म नाम
जन्म राज्यकाल मृत्यु
बाबर
ज़हीरुद्दीन मुहम्मद
23 फ़रवरी 1483 30 अप्रैल 1526 – 26 दिसम्बर 1530 5 जनवरी 1531 (आयु 47)
हुमायूँ
नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ
(पहला राज्यकाल)
17 मार्च 1508 26 दिसम्बर 1530 – 17 मई 1540 27 जनवरी 1556 (आयु 47)
हुमायूँ के बाद शेर शाह सूरी तथा इस्लाम शाह सूरी  ने सं १५४० से १५५५ तक सूर वंश चलाया |
हुमायूँ
नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ
(दूसरा राज्यकाल)
17 मार्च 1508 22 फ़रवरी 1555 – 27 जनवरी 1556 27 जनवरी 1556 (आयु 47)
अकबर-ए-आज़म
जलालुद्दीन मुहम्मद
14 अक्टूबर 1542 27 जनवरी 1556 – 27 अक्टूबर 1605 27 अक्टूबर 1605 (आयु 63)
जहांगीर
नूरुद्दीन मुहम्मद सलीम
20 सितम्बर 1569 15 अक्टूबर 1605 – 8 नवम्बर 1627 8 नवम्बर 1627 (आयु 58)
शाह-जहाँ-ए-आज़म
शहाबुद्दीन मुहम्मद ख़ुर्रम
5 जनवरी 1592 8 नवम्बर 1627 – 2 अगस्त 1658 22 जनवरी 1666 (आयु 74)
अलामगीर
मुइनुद्दीन मुहम्मद
4 नवम्बर 1618 31 जुलाई 1658 – 3 मार्च 1707 3 मार्च 1707 (आयु 88)
बहादुर शाह
क़ुतुबुद्दीन मुहम्मद मुआज्ज़म
14 अक्टूबर 1643 19 जून 1707 – 27 फ़रवरी 1712
(4 साल और 253 दिन)
27 फ़रवरी 1712 (आयु 68)
जहांदार शाह
माज़ुद्दीन जहंदर शाह बहादुर
9 मई 1661 27 फ़रवरी 1712 – 11 फ़रवरी 1713
(0 साल और 350 दिन)
12 फ़रवरी 1713 (आयु 51)
फर्रुख्शियार
फर्रुख्शियार
20 अगस्त 1685 11 जनवरी 1713 – 28 फ़रवरी 1719
(6 साल और 48 दिन)
29 अप्रैल 1719 (आयु 33)
रफी उल-दर्जत
रफी उल-दर्जत
30 नवम्बर 1699 28 फ़रवरी – 6 जून 1719
(0 साल और 98 दिन)
9 जून 1719 (आयु 19)
शाहजहां द्वितीय
रफी उद-दौलत
जून 1696 6 जून 1719 – 19 सितम्बर 1719
(0 साल और 105 दिन)
19 सितम्बर 1719 (आयु 23)
मुहम्मद शाह
रोशन अख्तर बहादुर
17 अगस्त 1702 27 सितम्बर 1719 – 26 अप्रैल 1748
(28 साल और 212 दिन)
26 अप्रैल 1748 (आयु 45)
अहमद शाह बहादुर
अहमद शाह बहादुर
23 दिसम्बर 1725 26 अप्रैल 1748 – 2 जून 1754
(6 साल और 37 दिन)
1 जनवरी 1775 (आयु 49)
आलमगीर द्वितीय
अज़ीज़ुद्दीन
6 जून 1699 2 जून 1754 – 29 नवम्बर 1759
(5 साल और 180 दिन)
29 नवम्बर 1759 (आयु 60)
शाहजहां तृतीय
मुही-उल-मिल्लत

10 दिसम्बर 1759 – 10 अक्टूबर 1760 1772
शाह आलम द्वितीय
अली गौहर
25 जून 1728 24 दिसम्बर 1759 – 19 नवम्बर 1806 (46 साल और 330 दिन) 19 नवम्बर 1806 (आयु 78)
अकबर शाह द्वितीय
मिर्ज़ा अकबर या अकबर शाह सानी
22 अप्रैल 1760 19 नवम्बर 1806 – 28 सितम्बर 1837 28 सितम्बर 1837 (आयु 77)
बहादुर शाह द्वितीय
अबू ज़फर सिराजुद्दीन मुहम्मद बहादुर शाह ज़फर या बहादुर शाह ज़फर
24 अक्टूबर 1775 28 सितम्बर 1837 – 14 सितम्बर 1857 (19 साल और 351 दिन) 7 नवम्बर 1862

सरदार भगत सिंह , Sardar Bhagat Singh


भगत सिंह (जन्म: सितम्बर १९०७)  मृत्यु: २३ मार्च १९३१ )

भारत के एक प्रमुख जाट स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़े आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गम्भीरता से याद किया। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की। इन सभी बम धमाको के लिए उन्होंने वीर सावरकर के क्रांतिदल अभिनव भारत की भी सहायता ली और इसी दल से बम बनाने के गुर सीखे।

जन्म और परिवेश

भगत सिंह का जन्म २७ सितंबर १९०७ को हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था | अमृतसर में १३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिये नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। काकोरी काण्ड में राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि पण्डित चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड गये और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस संगठन का उद्देश्य सेवा, त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे० पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने उनकी पूरी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने वर्तमान नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार संसद भवन में ८ अप्रैल १९२९ को अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी।

एसेम्बली में बम फेंकना

भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे । यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूँजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसन्द नहीं आती थी। भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अँग्रेजों तक उनकी ‘आवाज़’ भी पहुँचे। जेल में भगत सिंह ने करीब २ साल रहे। जेल में भगत सिंह व उनके साथियों ने ६४ दिनों तक भूख हडताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिये थे।
23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे| फांसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।
फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाये इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किये फिर इसे बोरियों में भरकर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आये। इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंका और भाग गये। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया। और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये। इसके बाद लोग अंग्रेजों के साथ-साथ गान्धी को भी इनकी मौत का जिम्मेवार समझने लगे। इस कारण जब गान्धी कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हिस्सा लेने जा रहे थे तो लोगों ने काले झण्डों के साथ गान्धीजी का स्वागत किया। एकाध जग़ह पर गान्धी पर हमला भी हुआ, किन्तु सादी वर्दी में उनके साथ चल रही पुलिस ने बचा लिया।

संयुक्त राष्ट्र संघ , UNO, United Nations Organization

संयुक्त राष्ट्र (अंग्रेज़ी: United Nations) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है, जिसके उद्देश्य में उल्लेख है कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून को सुविधाजनक बनाने के सहयोग, अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, सामाजिक प्रगति, मानव अधिकार और विश्व शांति के लिए कार्यरत है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना २४ अक्टूबर १९४५ को संयुक्त राष्ट्र अधिकारपत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता देशों ने मिलकर संयुक्त राष्ट्र को अन्तर्राष्ट्रीय संघर्ष में हस्तक्षेप करने के उद्देश्य से स्थापित किया था। वे चाहते थे कि भविष्य मे फ़िर कभी द्वितीय विश्वयुद्ध की तरह के युद्ध न उभर आए। संयुक्त राष्ट्र की संरचना में सुरक्षा परिषद वाले सबसे शक्तिशाली देश (संयुक्त राज्य अमेरिका, फ़्रांस, रूस और संयुक्त राजशाही) द्वितीय विश्वयुद्ध में बहुत अहम देश थे। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र मे १९३ देश है, विश्व के लगभग सारे अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त देश। इस संस्था की संरचन में आम सभा, सुरक्षा परिषद, आर्थिक व सामाजिक परिषद, सचिवालय और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय सम्मिलित है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 1929 में राष्ट्र संघ का गठन किया गया था। राष्ट्र संघ काफ़ी हद तक प्रभावहीन था और संयुक्त राष्ट्र का उसकी जगह होने का यह बहुत बड़ा फायदा है कि संयुक्त राष्ट्र अपने सदस्य देशों की सेनाओं को शांति संभालने के लिए तैनात कर सकता है।संयुक्त राष्ट्र के बारे में विचार पहली बार द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के पहले उभरे थे। द्वितीय भिश्व युद्ध मे विजयी होने वाले देशों ने मिलकर कोशिश की कि वे इस संस्था की संरचन, सदस्यता, आदि के बारे में कुछ निर्णय कर पाए।24 अप्रैल 1945 को, द्वितीय विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद, अमेरिका के सैन फ्रैंसिस्को में अंतराष्ट्रीय संस्थाओं की संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हुई और यहां सारे 40 उपस्थित देशों ने संयुक्त राष्ट्रिय संविधा पर हस्ताक्षर किया। पोलैंड इस सम्मेलन में उपस्थित तो नहीं थी, पर उसके हस्ताक्षर के लिए खास जगह रखी गई थी और बाद में पोलैंड ने भी हस्ताक्षर कर दिया। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी देशों के हस्ताक्षर के बाद संयुक्त राष्ट्र की अस्तित्व हुई।
2006 तक संयुक्त राष्ट्र में 192 सदस्य देश है।

संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय

संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में पचासी लाख डॉलर के लिए खरीदी भूसंपत्ति पर स्थापित है। इस इमारत की स्थापना का प्रबंध एक अंतर्राष्ट्रीय शिल्पकारों के समूह द्वारा हुआ। इस मुख्यालय के अलावा और अहम संस्थाएं जनीवा, कोपनहेगन आदि में भी है।

संयुक्त राष्ट्र की राज भाषा

संयुक्त राष्ट्र ने 6 भाषाओं को “राज भाषा” स्वीकृत किया है (अरबी, चीनी, अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी और स्पेनी), परंतु इन में से केवल दो भाषाओं को संचालन भाषा माना जाता है (अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी)।संयुक्त राष्ट्र अमेरिकी अंग्रेज़ी की जगह ब्रिटिश अंग्रेज़ी का प्रयोग करता है।

उद्देश्य

संयुक्त राष्ट्र के व्यक्त उद्देश्य हैं युद्ध रोकना, मानव अधिकारों की रक्षा करना, अंतर्राष्ट्रीय कानून को निभाने की प्रक्रिया जुटाना, सामाजिक और आर्थिक विकास, जीवन स्तर सुधारना और बिमारियों से लड़ना। सदस्य राष्ट्र को अंतर्राष्ट्रीय चिंताएं और राष्ट्रीय मामलों को सम्हालने का मौका मिलता है। इन उद्देश्य को निभाने के लिए 1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा प्रमाणित की गई।द्वितीय विश्वयुद्ध के जातिसंहार के बाद, संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों को बहुत आवश्यक समझा था। ऐसी घटनाओं को भविष्य में रोकना अहम समझकर, 1948 में सामान्य सभा ने मानव अधिकारों की सार्वभौम घोषणा को स्वीकृत किया। यह अबंधनकारी घोषणा पूरे विश्व के लिए एक समान दर्जा स्थापित करती है, जो कि संयुक्त राष्ट्र समर्थन करने की कोशिश करेगी।

संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र संस्थाएं


सं. लघुनाम संस्था मुख्यालय स्थापना
1 एफएओ
खाद्य एवं कृषि संगठन
 रोम, इटली १९४५
2 आईएईए अन्तर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा अभिकरण  वियना, ऑस्ट्रिया १९५७
3 आईसीएओ अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन मॉन्ट्रियल, कनाडा १९४७
4 आईएफएडी अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष  रोम, इटली १९७७
5 आईएलो अंतर्राष्ट्रीय श्रम संघ जेनेवा,स्विट्जरलैंड १९४६
6 आईएमओ अंतर्राष्ट्रीय सागरीय संगठन  लंदन, ब्रिटेन १९४८
7 आईएमएफ अंतर्राष्ट्रीय मॉनीटरी फंड  वाशिंगटन, सं.रा १९४५
8 आईटीयू अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ जेनेवा,स्विट्जरलैंड १९४७
9 यूनेस्को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन  पैरिस, फ्रांस १९४६
10 यूएनआईडीओ संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन  वियना, ऑस्ट्रिया १९६७
11 यूपीयू वैश्विक डाक संघ  बर्न, स्विट्जरलैंड १९४७
12 डब्ल्यु बी विश्व बैंक  वाशिंगटन, सं.रा १९४५
13 डब्ल्यु एफपी विश्व खाद्य कार्यक्रम  रोम, इटली १९६३
14 डब्ल्यु एच ओ विश्व स्वास्थ्य संगठन जेनेवा,स्विट्जरलैंड १९४८
15 डब्ल्युआईपीओ वर्ल्ड इन्टलेक्चुअल प्रोपर्टी ऑर्गनाइजेशन जेनेवा,स्विट्जरलैंड १९७४
16 डब्ल्युएमओ विश्व मौसम संगठन जेनेवा,स्विट्जरलैंड १९५०
17 डब्ल्युटीओ विश्व पर्यटन संगठन  मद्रीद, स्पेन
१९७४

सोवियत संघ का विघटन ,Soviet Union Partition

सोवियत संघ का विघटन ,Soviet Union Partition

सोवियत संघ का विघटन

सोवियत संघ का औपचारिक नाम सोवियत समाजवादी गणतंत्रों का संघ था।सोवियत  संघ 15 स्वशासित गणतंत्रों का संघ था सोवियत संघ की उत्त्पत्ति के बीज सन् 1917 ई. में घटित बोल्शेविक क्रान्ति में ढूंढ़ें जा सकते हैं।  7 नवम्बर 1917 ई. को व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में क्रांतिकारी बोल्शेविकों ने रूसी जार की सत्ता को उखाड़ फेंका और एक समाजवादी राज्य की स्थापना की। यह दुनिया की पहली साम्यवादी सरकार थी। इस घटना को ‘अक्टूबर क्रांति’ का नाम दिया गया। मार्च 1918 ई. में बोल्शेविक दल का नाम बदलकर साम्यवादी दल कर दिया गया। अब रूस साम्यवाद के एक मजबूत गढ़ के रूप में उभरा और धीरे धीरे इसमें यूरेशिया के दूर-दराज के समाजवादी गणराज्य राज्य भी शामिल हो गए। औपचारिक रूप से सोवियत संघ की स्थापना सन् 1922 ई. में की गयी जो कि तकनीकी रूप से 15 उप-राष्ट्रीय सोवियत गणराज्यों का एक संघ था किन्तु व्यवहारिक तौर पर यह एक अत्यंत केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था थी। सोवियत संघ ने सन् 1930 ई. के दशक की वैश्विक महामंदी का सफलतापूर्वक सामना किया तथा बीसवीं सदी के मध्य तक पर्याप्त आर्थिक प्रगति अर्जित की। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ मित्र शक्तियों के समूह में शामिल रहा किन्तु इस दौरान भी उसके पूंजीवादी देशों से मतभेद बरकरार रहे जो कि युद्ध की समाप्ति के पश्चात खुलकर सामने आ गये। इन मतभेदों की स्पष्ट अभिव्यक्ति 5 मार्च 1946 ई. को विंस्टन चर्चिल के प्रसिद्ध फुल्टन भाषण में मिली जिसमें उन्होंने पूर्वी यूरोप में छाए ‘लौह आवरण’ की बात की। इसके बाद से सन् 1991 ई. तक की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का लगभग हर पहलू प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सोवियत संघ और संयुक्त राज्य अमरीका के मध्य छिड़े ‘शीत युद्ध’ से प्रभावित होता रहा।रूस में अक्टूबर क्रान्ति आधुनिक ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 7 नवम्बर 1917 ई. को संपन्न हुई। किन्तु इसे अक्टूबर क्रान्ति कहा जाता है क्योंकि उस समय रूस में प्रचलित जूलियन कैलंडर के अनुसार वह तिथि 24 अक्टूबर थी।
1.1.2 विघटन की प्रक्रिया
सन् 1985 ई. में मिखाइल गोर्बाचेव कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने। इस समय सोवियत संघ जटिल आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों से जूझ रहा था। गोर्बाचेव ने ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका की नीतियों की शुरूआत की तथा विश्व भर में एक उदारवादी नेता की ख्याति अर्जित की। उनकी नीतियाँ विशेषतौर पर तब आकर्षण का केंद्र बनीं जबकि उन्हें सन् 1990 ई. में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। किन्तु वह सोवियत संघ के अन्दर गिरती हुई आर्थिक और सामाजिक दशाओं का उत्थान कर सकने में सफल न हो सके और परिणामतः देश के अन्दर अलोकप्रिय होते गये। अगस्त 1991 ई. में उनके खिलाफ विद्रोह हुआ तथा रक्षा मंत्री दिमित्री याजोव, उप राष्ट्रपति गेनाडी यानायेव और केजीबी प्रमुख ने राष्ट्रपति गोर्बाचेव को हिरासत में लिया। हालाँकि तीन दिनों के अन्दर ही इस विद्रोह का दमन कर दिया गया और गोर्बाचेव की सत्ता को पुनः स्थापित कर दिया गया। किन्तु यह अल्पकालिक राहत ही साबित हुई और शीघ्र ही पूर्वी यूरोप के अनेक देशों ने स्वयं को सोवियत संघ से स्वतंत्र घोषित कर दिया। अगस्त 1991 ई. में बाल्टिक गणराज्यों- एस्तोनिया, लात्विया और लिथुआनिया ने सोवियत संघ से अलग होने की घोषणा की। सितंबर 1991 ई. में ‘कांग्रेस ऑफ पीपल्स डिप्यूटीज’ ने सोवियत संघ के विघटन के लिए वोट डाला। 8 दिसंबर 1991 ई. को रूस, उक्रेन और बेलारूस के नेताओं ने कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट का गठन किया। 21 दिसंबर 1991 ई. को आर्मेनिया, अजरबैजान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, मोल्दोवा, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान के नेताओं ने ‘अल्मा-अता प्रोटोकॉल’ पर हस्ताक्षर कर ‘कॉमनवेल्थ ऑफ इंडिपेंडेंट स्टेट’ में शामिल होने की सहमति प्रदान की। इस बीच गोर्बाचेव और बोरिस येल्तसिन ने एक समझौते द्वारा सोवियत संघ के सभी केन्द्रीय संस्थानों को भंग करने का निर्णय लिया। गोर्बाचेव ने साम्यवादी दल के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया और इसकी केन्द्रीय समिति को भंग कर दल की समस्त संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। 26 दिसंबर 1991 ई. को सोवियत संघ के औपचारिक विघटन की घोषणा कर दी गयी तथा कभी साम्यवाद की शक्ति का केंद्र रहा विशालकाय देश इतिहास के गर्त में समा गया। सोवियत संघ के विघटन के फलस्वरूप विश्व में पंद्रह नए संप्रभु राज्यों- आर्मेनिया, अजरबैजान, बेलारूस, एस्टोनिया, जॉर्जिया, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, लातविया, लिथुआनिया, मोल्दोवा, रूस, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, यूक्रेन और उजबेकिस्तान का प्रादुर्भाव हुआ।
कभी विश्व शक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहे सोवियत संघ में सन् 1980 ई. के दशक के उत्तरार्ध में नाटकीय परिवर्तन दृष्टिगोचर हुए और 25 दिसम्बर 1991 ई. को मोस्को स्थित क्रेमलिन में सोवियत संघ का ध्वज आख़िरी बार फहरा। इस दिन सोवियत संघ के विघटन की औपचारिक घोषणा की गयी तथा 26 दिसम्बर 1991 ई. से यह देश अस्तित्व में नहीं रहा। पूंजीवादी देशों ने इस घटना का स्वतंत्रता की नयी सुबह, सर्वाधिकारवाद पर लोकतंत्र की विजय और पूंजीवाद की साम्यवाद पर श्रेष्ठता स्थापित होने के रूप में स्वागत किया। किन्तु अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विद्वानों ने सोवियत संघ के विघटन के कारणों की विस्तृत पड़ताल की है तथा इसके लिए अनेक आतंरिक एवं वाह्य कारकों को उत्तरदायी माना है।

सोवियत संघ के विघटन से बने नवीन राज्य

1. आर्मेनिया
2. अज़रबैजान
3. बेलारूस
4. एस्टोनिया
5. जॉर्जिया
6. कजाखस्तान
7. किर्गिस्तान
8. लातविया
9. लिथुआनिया
10 मोल्दोवा
11. रूस
12. ताजिकिस्तान
13. तुर्कमेनिस्तान
14. यूक्रेन
15. उजबेकिस्तान
स्रोत :wikipedia

 

Friday, 16 December 2016

Indian History Time Line , भारतीय इतिहास समय रेखा, Till 1950

Indian History Time Line , भारतीय इतिहास समय रेखा, Till 1950


Indian History Time Line , भारतीय इतिहास समय रेखा


ईसा पूर्व (BC)

3000-1500 : सिंधु घाटी सभ्‍यता
563 : गौतम बुद्ध का जन्‍म
540 : महावीर का जन्‍म
327-326 : भारत पर एलेक्‍जेंडर का हमला। इसने भारत और यूरोप के बीच एक भू-मार्ग खोल दिया
313 : जैन परंपरा के अनुसार चंद्रगुप्‍त का राज्‍याभिषेक
305 : चंद्रगुप्‍त मौर्य के हाथों सेल्‍युकस की पराजय
273-232 : अशोक का शासन
261 : कलिंग की विजय
145-101 : एलारा का क्षेत्र, श्रीलंका के चोल राजा
58 : विक्रम संवत् का आरम्‍भ
ईसवी (AD)
78 : शक संवत् का आरम्‍भ
120 : कनिष्‍क का राज्‍याभिषेक
320 : गुप्‍त युग का आरम्‍भ, भारत का स्‍वर्णिम काल
380 : विक्रमादित्‍य का राज्‍याभिषेक
405-411 : चीनी यात्री फाहयान की यात्रा
415 : कुमार गुप्‍त-1 का राज्‍याभि‍षेक
455 : स्‍कंदगुप्‍त का राज्‍याभिषेक
606-647 : हर्षवर्धन का शासन
712 : सिंध पर पहला अरब आक्रमण836 : कन्‍नौज के भोज राजा का राज्‍याभिषेक
985 : चोल शासक राजाराज का राज्‍याभिषेक
998 : सुल्‍तान महमूद का राज्‍याभिषेक
1000 से 1499
1001 : महमूद गजनी द्वारा भारत पर पहला आक्रमण, जिसने पंजाब के शासक जयपाल को हराया था
1025 : महमूद गजनी द्वारा सोमनाथ मंदिर का विध्‍वंस
1191 : तराई का पहला युद्ध
1192 : तराई का दूसरा युद्ध
1206 : दिल्‍ली की गद्दी पर कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्‍याभिषेक
1210 : कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्‍यु
1221 : भारत पर चंगेज खान का हमला (मंगोल का आक्रमण)
1236 : दिल्‍ली की गद्दी पर रजिया सुल्‍तान का राज्‍याभिषेक
1240 : रजिया सुल्‍तान की मृत्‍यु
1296 : अलाउद्दीन खिलजी का हमला
1316 : अलाउद्दीन खिलजी की मृत्‍यु
1325 : मोहम्‍मद तुगलक का राज्‍याभिषेक
1327 : तुगलकों द्वारा दिल्‍ली से दौलताबाद और फिर दक्‍कन को राजधानी बनाया जाना
1336 : दक्षिण में विजयानगर साम्राज्‍य की स्‍थापना
1351 : फिरोजशाह का राज्‍याभिषेक
1398 : तैमूरलंग द्वारा भारत पर हमला
1469 : गुरुनानक का जन्‍म
1494 : फरघाना में बाबर का राज्‍याभिषेक
1497-98 : वास्‍को-डि-गामा की भारत की पहली यात्रा (केप ऑफ गुड होप के जरिए भारत तक समुद्री रास्‍ते   की खोज)
1500 से 1799
1526 : पानीपत की पहली लड़ाई, बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराया- बाबर द्वारा मुगल शासन की स्‍थापना
1527 खानवा की लड़ाई, बाबर ने राणा सांगा को हराया
1530 : बाबर की मृत्‍यु और हुमायूं का राज्‍याभिषेक
1539 : शेरशाह सूरी ने हुमायूं का हराया और भारतीय का सम्राट बन गया
1540 : कन्‍नौज की लड़ाई
1555 : हुमायूं ने दिल्‍ली की गद्दी को फिर से हथिया लिया
1556 : पानीपत की दूसरी लड़ाई
1565 : तालीकोट की लड़ाई
1576 : हल्‍दीघाटी की लड़ाई- राणा प्रताप ने अकबर को हराया
1582 : अकबर द्वारा दीन-ए-इलाही की स्‍थापना
1597 : राणा प्रताप की मृत्‍यु
1600 : ईस्‍ट इंडिया कंपनी की स्‍थापना
1605 : अकबर की मृत्‍यु और जहाँगीर का राज्‍याभिषेक
1606 : गुरु अर्जुन देव का वध
1611 : नूरजहाँ से जहांगीर का विवाह
1616 : सर थॉमस रो ने जहाँगीर से मुलाकात की
1627 : शिवाजी का जन्‍म और जहांगीर की मृत्‍यु
1628 : शाहजहां भारत के सम्राट बने
1631 : मुमताज महल की मृत्‍यु
1634 : भारत के बंगाल में अंग्रेजों को व्‍यापार करने की अनुमति दे दी गई
1659 : औरंगजेब का राज्‍याभिषेक, शाहजहाँ को कैद कर लिया गया
1665 : औरंगजेब द्वारा शिवाजी को कैद कर लिया गया
1680 : शिवाजी की मृत्‍यु
1707 : औरंगजेब की मृत्‍यु
1708 : गुरु गोबिंद सिंह की मृत्‍यु
1739 : नादिरशाह का भारत पर हमला
1757 : प्‍लासी की लड़ाई, लॉर्ड क्‍लाइव के हाथों भारत में अंग्रेजों के राजनीतिक शासन की स्‍थापना 1761पानीपत की तीसरी लड़ाई, शाहआलम द्वितीय भारत के सम्राट बने
1764 : बक्‍सर की लड़ाई
1765 : क्‍लाइव को भारत में कंपनी का गर्वनर नियुक्‍त किया गया
1767-69 : पहला मैसूर युद्ध
1770 : बंगाल का महान अकाल
1780 : महाराजा रणजीत सिंह का जन्‍म
1780-84 : दूसरा मैसूर युद्ध
1784 : पिट्स अधिनियम
1793 : बंगाल में स्‍थायी बंदोबस्‍त
1799 : चौथा मैसूर युद्ध- टीपू सुल्‍तान की मृत्‍यु
1800 – 1900संपादित करें
1802 : बेसेन की संधि
1809 : अमृतसर की संधि
1829 : सती प्रथा को प्रतिबंधित किया गया
1830 : ब्रह्म समाज के संस्‍थापक राजाराम मोहन राय की इंग्‍लैंड की यात्रा
1833 : राजाराम मोहन राय की मृत्‍यु
1839 : महाराजा रणजीत सिंह की मृत्‍यु
1839-42 : पहला अफगान युद्ध
1845-46 : पहला अंग्रेज-सिक्‍ख युद्ध
1852 : दूसरा अंग्रेज-बर्मा युद्ध
1853 : बांबे से थाने के बीच पहली रेलवे लाइन और कलकत्‍ता में टेलीग्राफ लाइन खोली गई
1857 : स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम (या सिपाही विद्रोह)
1861 : रबीन्‍द्रनाथ टैगोर का जन्‍म
1869 : महात्‍मा गांधी का जन्‍म
1885 : भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की स्‍थापना
1889 : जवाहरलाल नेहरु का जन्‍म
1897 : सुभाष चंद्र बोस का जन्‍म
1905 : लॉर्ड कर्जन द्वारा बंगाल का पहला बंटवारा
1906 : मुस्लिम लीग की स्‍थापना
1911 : दिल्‍ली दरबार- ब्रिटिश के राजा और रानी की भारत यात्रा- दिल्‍ली भारत की राजधानी बनी
1916 : पहले विश्‍व युद्ध की शुरुआत
1916 : मुस्लिम लीग और कांग्रेस द्वारा लखनऊ समझौते पर हस्‍‍ताक्षर
1918 : पहले विश्‍व युद्ध की समाप्ति
1919 : मताधिकार पर साउथबरो कमिटी, मांटेग्‍यू-चेम्‍सफोर्ड सुधार- अमृतसर में जालियाँवाला बाग हत्‍याकांड
1920 : खिलाफत आंदोलन की शुरुआत
1927 : साइमन कमीशन का बहिष्‍कार, भारत में प्रसारण की शुरुआत
1928 : लाला लाजपतराय की मृत्‍यु (शेर-ए-पंजाब)
1929 : लॉर्ड ऑर्वम समझौता, लाहौर कांग्रेस में पूर्ण स्‍वतंत्रता का प्रस्‍ताव पास
1930 : सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत- महात्‍मा गांधी द्वारा दांडी मार्च (अप्रैल 6, 1930)
1931 : गांधी-इर्विन समझौता
1935 : भारत सरकार अधिनियम पारित
1937 : प्रांतीय स्‍वायतता, कांग्रेस मंत्रियों का पदग्रहण
1941 : रबीन्‍द्रनाथ टैगोर की मृत्‍यु, भारत से सुभाष चंद्र बोस का पलायन
1942 : क्रिप्‍स मिशन के भारत आगमन पर भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत
1943-44 : नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने प्रांतीय आजाद हिंदू हुकूमत, भारतीय राष्‍ट्रीय सेना की स्‍थापना की और बंगाल में अकाल
1945 : लाल‍ किले में आईएनए का ट्रायल, शिमला समझौता और द्वितीय विश्‍व युद्ध की समाप्ति
1946 : ब्रिटिश कैबिनेट मिशन की भारत यात्रा- केंद्र में अंतरिम सरकार का गठन
1947 : भारत का विभाजन व स्वतंत्रता
आजादी के बाद का इतिहास इस प्रकार है –
1947 : 15 अगस्त को देश को अंग्रेजों की गुलामी से निजात मिली।
1948 : 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या। इसी वर्ष भारतीय हॉकी टीम ने लंदन ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीता।
1950 : 26 जनवरी को भारत गणतंत्र बना। संविधान लागू।

महाजनपद, Maha Janapad

महाजनपद, Maha Janapad


महाजनपद

प्राचीन भारत मे राज्य या प्रशासनिक इकाईयों को ‘महाजनपद’ कहते थे। उत्तर वैदिक काल में कुछ जनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथों में इनका कई बार उल्लेख हुआ है।यद्यपि कुल सोलह महाजनपदों का नाम मिलता है पर ये नामाकरण अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न हैं। इतिहासकार ऐसा मानते हैं कि ये अन्तर भिन्न-भिन्न समय पर राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने के कारण हुआ है। इसके अतिरिक्त इन सूचियों के निर्माताओं की जानकारी भी उनके भौगोलिक स्थिति से अलग हो सकती है। बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय, महावस्तु मे १६ महाजनपदों का उल्लेख है-
अवन्ति – आधुनिक मालवा का प्रदेश जिसकी राजधानी उज्जयिनी और महिष्मति थी।
अश्मक या अस्सक – दक्षिण भारत का एकमात्र महाजनपद। नर्मदा और गोदावरी नदियों के बीच अवस्थित इस प्रदेश की राजधानी पाटन थी।
अंग – वर्तमान के बिहार के मुंगेर और भागलपुर जिले। इनकी राजधानी चंपा थी।
कम्बोज – पाकिस्तान का हजारा जिला।
काशी – इसकी राजधानी वाराणसी थी। वर्तमान की वाराणसी व आसपास का क्षेत्र इसमें सम्मिलित रहा था।
कुरु – आधुनिक हरियाणा तथा दिल्ली का यमुना नदी के पश्चिम वाला अंश शामिल था। इसकी राजधानी आधुनिक दिल्ली (इन्द्रप्रस्थ) थी।
कोशल – उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिला, गोंडा और बहराइच के क्षेत्र शामिल थे। इसकी राजधानी श्रावस्ती थी।
गांधार – पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफ़ग़ानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र। इसे आधुनिक कंदहार से जोड़ने की गलती कई बार लोग कर देते हैं जो कि वास्तव में इस क्षेत्र से कुछ दक्षिण में स्थित था।
चेदि – वर्तमान में बुंदेलखंड का इलाका।
वज्जि या वृजि’ – यह आठ गणतांत्रिक कुलों का संघ था जो उत्तर बिहार में गंगा के उत्तर में अवस्थित था तथा जिसकी राजधानी वैशाली थी। इसमें आज के बिहार राज्य के दरभंगा, मधुबनी व मुजफ्फरपुर जिले सम्मिलित थे।
वत्स या वंश – आधुनिक उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद तथा मिर्ज़ापुर जिले।
पांचाल – पश्चिमी उत्तर प्रदेश। इसकी राजधानी अहिच्छत्र थी।
मगध – दक्षिण बिहार में अवस्थित। शतपथ ब्राह्मण में इसे ‘कीकट’ कहा गया है। आधुनिक पटना तथा गया जिले और आसपास के क्षेत्र।
मत्स्य या मच्छ – इसमें राजस्थान के अलवर, भरतपुर तथा जयपुर जिले के क्षेत्र शामिल थे।
मल्ल – यह भी एक गणसंघ था और पूर्वी उत्तर प्रदेश के इलाके इसके क्षेत्र थे।
सुरसेन या शूरसेन – इसकी राजधानी मथुरा थी।
ये सभी महाजनपद आज के उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान से बिहार तक और हिन्दुकुश से गोदावरी नदी तक में फैला हुआ था।
ईसापूर्व छठी सदी में अवंति के राजा प्रद्योत ने कौशाम्बी के राजा तथा प्रद्योत के दामाद उदयन के साथ लड़ाई हुई थी। उससे पहले उदयन ने मगध की राजधानी राजगृह पर हमला किया था। कोसल के राजा प्रसेनजित ने काशी को अपने अधीन कर लिया और बाद में उसके पुत्र ने कपिलवस्तु के शाक्य राज्य को जीत लिया। मगध के राजा बिंबिसार ने अंग को अपने में मिला लिया तथा उसके पुत्र अजातशत्रु ने वैशाली क लिच्छवियों को जीत लिया।

वैदिक सभ्यता, वैदिक काल , उत्तर वैदिक काल , Vedic Period

वैदिक सभ्यता, वैदिक काल , उत्तर वैदिक काल , Vedic Period


वैदिक सभ्यता प्राचीन भारत की सभ्यता है जिसमें वेदों की रचना हुई। भारतीय विद्वान् तो इस सभ्यताको अनादि परम्परा आया हुवा मानते हैं | कुछ लोग तो भारत में आज से लगभग ७००० इस्वी ईसा पूर्व शुरु हई थी ऐसा मानते है, परन्तु पश्चिमी विद्वानो के अनुसार आर्यों का एक समुदाय भारत मे लगभग २००० इस्वी ईसा पूर्व आया और उनके आगमन के साथ ही यह सभ्यता आरंभ हुई थी। आम तौर पर अधिकतर विद्वान वैदिक सभ्यता का काल २००० इस्वी ईसा पूर्व से ६०० इस्वी ईसा पूर्व के बीच मे मानते है, परन्तु नए पुरातत्त्व उत्खननो से मिले अवशेषों मे वैदिक सभ्यता के कई अवशेष मिले हैं जिससे आधुनिक विद्वान जैसे डेविड फ्राले, तेलगिरी, बी बी लाल, एस र राव, सुभाष काक, अरविन्दो यह मानने लगे है कि वैदिक सभ्यता भारत मे ही शुरु हुई थी और ऋग्वेद का रचना काल ४०००-३००० इस्वी ईसा पूर्व रहा होगा, क्योकि आर्यो के भारत मे आने का न तो कोई पुरातत्त्व उत्खननो से प्रमाण मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानो से कोई प्रमाण मिला है इस काल में वर्तमान हिंदू धर्म के स्वरूप की नींव पड़ी थी जो आज भी अस्तित्व में है। वेदों के अतिरिक्त संस्कृत के अन्य कई ग्रंथो की रचना भी इसी काल में हुई थी। वेदांगसूत्रौंकी रचना मन्त्र ब्राह्मणग्रंथ और उपनिषद इन वैदिकग्रन्थौंको व्यवस्थित करनेमे हुआ है | अनन्तर रामायण, महाभारत,और पुराणौंकी रचना हुआ जो इस काल के ज्ञानप्रदायी स्रोत मानागया हैं। अनन्तर चार्वाक , तान्त्रिकौं ,बौद्ध और जैन धर्म का उदय भी हुआ |इतिहासकारों का मानना है कि आर्य मुख्यतः उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों रहते थे इस कारण आर्य सभ्यता का केन्द्र मुख्यतः उत्तरी भारत था। इस काल में उत्तरी भारत (आधुनिक पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा नेपाल समेत) कई महाजनपदों में बंटा था।इस काल की तिथि निर्धारण जितनी विवादास्पद रही है उतनी ही इस काल के लोगों के बारे में सटीक जानकारी। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि इस समय तक केवल इसी ग्रंथ (ऋग्वेद) की रचना हुई थी। मैक्स मूलर के अनुसार आर्य का मूल निवास मध्य ऐशिया है। बोगाज-कोई (एशिया माईनर) में पाए गए 1400 ईसा पूर्व के अभिलेख में हिंदू देवताओं इंद, मित्रावरुण, नासत्य इत्यादि को देखते हुए इसका काल और पीछे माना जा सकता है।
बाल गंगाधर तिलक ने ज्योतिषीय गणना करके इसका काल 6000 ई.पू. माना था।प्रशासन की सबसे छोटी इकाई कुल थी। एक कुल में एक घर में एक छत के नीचे रहने वाले लोग शामिल थे। एक ग्राम कई कुलों से मिलकर बना होता था। ग्रामों का संगठन विश् कहलाता था और विशों का संगठन जन। कई जन मिलकर राष्ट्र बनाते थे।राष्ट्र (राज्य) का शासक राजन् (राजा) कहलाता था। जो राजा बड़े होते थे उन्हें सम्राट कहते थे।

उत्तरवैदिक काल (१०००-६०० ई०पू०)

ऋग्वैदिक काल में आर्यों का निवास स्थान सिंधु तथा सरस्वती नदियों के बीच में था। बाद में वे सम्पूर्ण उत्तर भारत में फ़ैल चुके थे। सभ्यता का मुख्य क्षेत्र गंगा और उसकी सहायक नदियों का मैदान हो गया था। गंगा को आज भारत की (या बोले तो हिदुओं की) सबसे पवित्र नदी माना जाता है। इस काल में विश् का विस्तार होता गया और कई जन विलुप्त हो गए। भरत, त्रित्सु और तुर्वस जैसे जन् राजनीतिक हलकों से ग़ायब हो गए जबकि पुरू पहले से अधिक शक्तिशाली हो गए। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ नए राज्यों का विकास हो गया था, जैसे – काशी, कोसल, विदेह, मगध और अंग।
ऋग्वैदिक काल में सरस्वती नदी को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ग॓गा और यमुना नदी का उल्लेख केवल एक बार हुआ है

वैदिक साहित्य

वैदिक साहित्य में चार वेद एवं उनकी संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषदों एवं वेदांगों को शामिल किया जाता है।
 वेदों की संख्या चार है- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
 ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद विश्व के प्रथम प्रमाणिक ग्रन्थ है।

ऋग्वेद

ऋग्वेद देवताओं की स्तुति से सम्बंधित रचनाओं का संग्रह है। यह 10 मंडलों में विभक्त है। इसमे 2 से 7 तक के मंडल प्राचीनतम माने जाते हैं। प्रथम एवं दशम मंडल बाद में जोड़े गए हैं। इसमें 1028 सूक्त हैं। इसकी भाषा पद्यात्मक है। ऋग्वेद में 33 देवो (दिव्य गुणो से युक्त पदार्थो) का उल्लेख मिलता है।  प्रसिद्ध गायत्री मंत्र जो सूर्य से सम्बंधित देवी गायत्री को संबोधित है, ऋग्वेद में सर्वप्रथम प्राप्त होता है। ‘ असतो मा सद्गमय ‘ वाक्य ऋग्वेद से लिया गया है।  ऋग्वेद में मंत्र को कंठस्त करने में स्त्रियों के नाम भी मिलते हैं, जिनमें प्रमुख हैं- लोपामुद्रा, घोषा, शाची, पौलोमी एवं काक्षावृती आदि  इसके पुरोहित क नाम होत्री है।

यजुर्वेद

यजु का अर्थ होता है यज्ञ। यजुर्वेद वेद में यज्ञ की विधियों का वर्णन किया गया है। इसमे मंत्रों का संकलन आनुष्ठानिक यज्ञ के समय सस्तर पाठ करने के उद्देश्य से किया गया है। इसमे मंत्रों के साथ साथ धार्मिक अनुष्ठानों का भी विवरण है जिसे मंत्रोच्चारण के साथ संपादित किए जाने का विधान सुझाया गया है। यजुर्वेद की भाषा पद्यात्मक एवं गद्यात्मक दोनों है। यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- कृष्ण यजुर्वेद तथा शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद की चार शाखाएं हैं- मैत्रायणी संहिता, काठक संहिता, कपिन्थल तथा संहिता। शुक्ल यजुर्वेद की दो शाखाएं हैं- मध्यान्दीन तथा कण्व संहिता।यह 40 अध्याय में विभाजित है।इसी ग्रन्थ में पहली बार राजसूय तथा वाजपेय जैसे दो राजकीय समारोह का उल्लेख है।

सामवेद

सामवेद की रचना ऋग्वेद में दिए गए मंत्रों को गाने योग्य बनाने हेतु की गयी थी।इसमे 1810 छंद हैं जिनमें 75 को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में उल्लेखित हैं।सामवेद तीन शाखाओं में विभक्त है- कौथुम, राणायनीय और जैमनीय।सामवेद को भारत की प्रथम संगीतात्मक पुस्तक होने का गौरव प्राप्त है।

अथर्ववेद

इसमें प्राक्-ऐतिहासिक युग की मूलभूत मान्यताओं, परम्पराओं का चित्रण है। अथर्ववेद 20 अध्यायों में संगठित है। इसमें 731 सूक्त एवं 6000 के लगभग मंत्र हैं।इसमें रोग तथा उसके निवारण के साधन के रूप में जानकारी दी गयी है।अथर्ववेद की दो शाखाएं हैं- शौनक और पिप्लाद।इसे अनार्यों की कृति माना जाता है।

ब्राह्मण

वैदिक मन्त्रों तथा संहिताओंको ब्रह्म कहा गया है | वही ब्रह्मका विस्तारितरुपको ब्राह्मण कहा गया है। पुरातन ब्राह्मण में ऐतरेय, शतपथ, पंचविश, तैतरीय आदि विशेष महत्वपूर्ण हैं। महर्षि याज्ञवल्क्यने मन्त्रसहितब्राह्मणग्रंथों की उपदेश आदित्यसे प्राप्त कीया है |संहिताओं के अन्तर्गत कर्मकांड की जो विधि उपदिष्ट है ब्रह्मणमे उसीकी सप्रमाण व्याख्या देखनेको मिलता है |प्राचीन परम्परामे आश्रमानुरुप वेदोका पाठ करनेकी विधि थी | अतः ब्रह्मचारिलोग मन्त्रौंका ही पाठ करते थे ,गृहस्थ ब्राह्मणौंका, वानप्रस्थ आरण्यौंका और सन्न्यास उपनिषदौंका | गार्हस्थ्यधर्मका मननीय वेदभाग ही ब्राह्मण है |यह मुख्यतः गद्य शैली में उपदिष्ट है।ब्राह्मण ग्रंथों से हमें बिम्बिसार के पूर्व की घटना का ज्ञान प्राप्त होता है।ऐतरेय ब्राह्मण में आठ मंडल हैं और पाँच अध्याय हैं। इसे पञ्जिका भी कहा जाता है।ऐतरेय ब्राह्मण में राज्याभिषेक के नियम प्राप्त होते हैं|तैतरीय ब्राह्मण कृष्णयजुर्वेदका ब्राह्मण है |शतपथ_ब्राह्मण में १०० अध्याय,१४ काण्ड और ४३८ ब्राह्मण है |गान्धार, शल्य, कैकय, कुरु, पांचाल, कोसल, विदेह आदि स्थलौंका भी उल्लेख होता है।शतपथ ब्राह्मण ऐतिहासिक दृष्टी से सर्वाधिक महत्वपूर्ण ब्राह्मण है।
पञ्चविंश/ षड्विंश ब्राह्मण सामवेद सम्बद्ध ब्राह्मण है |सर्वाधिक परवर्ती ब्राह्मण गोपथ है।

आरण्यक

आरण्यक वेदौंकी वह भाग है जो गृहस्थाश्रम त्याग उपरान्त वानप्रस्थि लोग जंगल में पाठ कीया करते थे | इसी कारण आरण्यक नामाकरण की गई थी।इसका प्रमुख प्रतिपाद्य विषय रहस्यवाद, प्रतीकवाद, यज्ञ और पुरोहित दर्शन है।वर्तमान में सात अरण्यक उपलब्ध हैं।सामवेद और अथर्ववेद का कोई आरण्यक नहीं है।

उपनिषद

उपनिषद प्राचीनतम दार्शनिक विचारों का संग्रह है। उपनिषदों में ‘वृहदारण्यक’ तथा ‘छान्दोन्य’, सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इन ग्रन्थों से बिम्बिसार के पूर्व के भारत की अवस्था जानी जा सकती है। परीक्षित, उनके पुत्र जनमेजय तथा पश्चातकालीन राजाओं का उल्लेख इन्हीं उपनिषदों में किया गया है। इन्हीं उपनिषदों से यह स्पष्ट होता है कि आर्यों का दर्शन विश्व के अन्य सभ्य देशों के दर्शन से सर्वोत्तम तथा अधिक आगे था। आर्यों के आध्यात्मिक विकास, प्राचीनतम धार्मिक अवस्था और चिन्तन के जीते-जागते जीवन्त उदाहरण इन्हीं उपनिषदों में मिलते हैं। उपनिषदों की रचना संभवतः बुद्ध के काल में हुई, क्योंकि भौतिक इच्छाओं पर सर्वप्रथम आध्यात्मिक उन्नति की महत्ता स्थापित करने का प्रयास बौद्ध और जैन धर्मों के विकास की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप हुआ ।कुल उपनिषदों की संख्या 108 है।
मुख्य रूप से शास्वत आत्मा, ब्रह्म, आत्मा-परमात्मा के बीच सम्बन्ध तथा विश्व की उत्पत्ति से सम्बंधित रहस्यवादी सिधान्तों का विवरणदिया गया है।“सत्यमेव जयते” मुण्डकोपनिषद से लिया गया है। मैत्रायणी उपनिषद् में त्रिमूर्ति और चार्तुआश्रम सिद्धांत का उल्लेख है।

वेदांग

युगान्तर में वैदिक अध्ययन के लिए छः विधाओं (शाखाओं) का जन्म हुआ जिन्हें ‘वेदांग’ कहते हैं। वेदांग का शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंग, तथापि इस साहित्य के पौरूषेय होने के कारण श्रुति साहित्य से पृथक ही गिना जाता है। वेदांग को स्मृति भी कहा जाता है, क्योंकि यह मनुष्यों की कृति मानी जाती है। वेदांग सूत्र के रूप में हैं इसमें कम शब्दों में अधिक तथ्य रखने का प्रयास किया गया है।वेदांग की संख्या 6 है शिक्षा- स्वर ज्ञान,कल्प- धार्मिक रीति एवं पद्धति,निरुक्त- शब्द व्युत्पत्ति शास्त्र,व्याकरण- व्याकरण,छंद- छंद शास्त्र,ज्योतिष- खगोल विज्ञान
सूत्र साहित्य
सूत्र साहित्य वैदिक साहित्य का अंग है। उसे समझने में सहायक भी है।
कल्प सूत्र- ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण। वेदों का हस्त स्थानीय वेदांग।
श्रोत सूत्र- महायज्ञ से सम्बंधित विस्तृत विधि-विधानों की व्याख्या। वेदांग कल्पसूत्र का पहला भाग।
स्मार्तसूत्र – षोडश संस्कारों का विधान करने वाला कल्प का दुसरा भाग
शुल्बसूत्र- यज्ञ स्थल तथा अग्निवेदी के निर्माण तथा माप से सम्बंधित नियम इसमें हैं। इसमें भारतीय ज्यामिति का प्रारम्भिक रूप दिखाई देता है। कल्प का तीसरा भाग।
धर्म सूत्र- इसमें सामाजिक धार्मिक कानून तथा आचार संहिता है। कल्प का चौथा भाग
गृह्यसूत्र- परुवारिक संस्कारों, उत्सवों तथा वैयक्तिक यज्ञों से सम्बंधित विधि-विधानों की चर्चा है।
स्रोत : विकिपीडिया एवं अन्य स्रोत

सिन्धु घटी सभ्यता ,Indus Valley Civilization

सिन्धु घटी सभ्यता ,Indus Valley Civilization

सिंधु घाटी सभ्यता(३३००-१७०० ई.पू.). विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह हड़प्पा सभ्यता और ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा, राखीगढ़ी और हड़प्पा इसके प्रमुख केन्द्र थे।दिसम्बर २०१४ में भिर्दाना को अबतक का खोजा गया , सिंधु घाटी सभ्यता का, सबसे प्राचीन नगर माना गया है  । 1826 चार्ल्स मैसेन ने पहली बार इस पुरानी सभ्यता को खोजा। कनिंघम ने 1856 में इस सभ्यता के बारे में सर्वेक्षण किया। 1856 में कराची से लाहौर के मध्य रेलवे लाइन के निर्माण के दौरान बर्टन बंधुओं द्वारा हड़प्पा स्थल की सूचना सरकार को दी। इसी क्रम में 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम के निर्देशन में भारतीय पुरातत्व विभाग की स्थापना की। 1904 मे लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग (ASI) का महानिदेशक बनाया गया।  १९२१ में दयाराम साहनी ने हड़प्पा का उत्खनन किया। इस प्रकार इस सभ्यता का नाम हड़प्पा सभ्यता रखा गया।  प्रथम बार नगरों के उदय के कारण इसे प्रथम नगरीकरण तथा प्रथम बार कांस्य के प्रयोग के कारण इसे कांस्य सभ्यता भी कहा जाता है।सर्वाधिक मान्यता 2300-1750 ई. पूर्व है | लोगों का जीवन , नगरीकृत संस्कृति थी, कृषि एवं पशुपालन इनका मुख्य व्यवसाय था. ये गेहूं, जौ, मटर, तरबूज आदि का उत्पादन करते थे और बैल, हांथी, भैंस, घोड़े,सूअर आदि का पालन करते थे. सूती व ऊनी धागा तैयार करना एवं उनसे कपडे बनाना जानते थे. सिन्धु समाज मातृसत्तात्मक था. सभ्यता के लोगों की कलात्मक जानकारी उनके बर्तनों पर चित्रकारी, सिक्कों के चलन, और आभूषण आदि से पता चलती है. वे प्रकृति पूजा व पुनर्जन्म में विश्वास रखते थे. उनकी मुहरों से भाषा एवं लिपि का ज्ञान होता है जो अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है.नगर तथा भवन निर्माण :- सिन्धु सभ्यता की नगर योजना सबसे विकसित थी लगभग 33 फीट चौड़ी सड़कें और पक्के मकान, चौराहे बने थे. नगरों में समकोण आधारित सड़कें, कब्रिस्तान, अनाज भंडारगृह और पक्की ईंटों के तालाब (सामूहिक स्नानागार) आदि का निर्माण था जो की तत्कालीन सभ्यता में अद्वितीय था. यहाँ के भवनों में दरवाजे, खिड़कियाँ, रोशनदान, पक्के फर्श, स्नान गृह, नालियां आदि बने थे.सिन्धु सभ्यता और सुमेरियन सभ्यता के बीच घनिष्ठ व्यापारिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्ध थे.सुमेरियन साक्ष्यों में सिन्धु सभ्यता का उल्लेख “दिलमुन” नाम से है. सुमेरियन एवं मेसोपोटामियन सभ्यता में भी पक्की ईंटों के भवन, पीतल व तांबे का प्रयोग, चित्रमय मुहरें आदि प्रचलित थी.मोहनजोदड़ो के धान्य कोठार इस सभ्यता की सबसे बड़ी संरचना है.लोथल (भोगवा नदी के तट पर) में सिन्धु सभ्यता का एकमात्र बंदरगाह स्थित था. सिन्धु क्षेत्र को मेहुल भी कहा गया है. चावल के साक्ष्य लोथल व रंगपुर से मिले है. इस सभ्यता का सबसे विकसित स्थल धौलावीरा था.हडप्पाकालीन लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था.
यह सभ्यता मुख्यतः 2500 ई.पू. से 1800 ई. पू. तक रही। ऐसा आभास होता है कि यह सभ्य्ता अपने अंतिम चरण में ह्वासोन्मुख थी। इस समय मकानों में पुरानी ईंटों के प्रयोग की जानकारी मिलती है। इसके विनाश के कारणों पर विद्वान एकमत नहीं हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के अवसान के पीछे विभिन्न तर्क दिये जाते हैं जैसे: बर्बर आक्रमण, जलवायु परिवर्तन एवं पारिस्थितिक असंतुलन, बाढ तथा भू-तात्विक परिवर्तन, महामारी, आर्थिक कारण। मोहेन्जो दरो मे नग‍र और जल निकास कि वय्व्वस्था से महामरी कि सम्भावन कम लगति है। भिशन अग्निकान्द के भि प्रमान प्राप्त हुए है। मोहेन्जोदरो के एक कमरे से १४ नर कन्काल मिले है जो आक्रमन, आगजनि, महामारी के संकेत है।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख भारत में लोकेशन

गुजरात  लोथल,सुरकोतदा,रंगपुर,रोजदी,मालवड,देसलपुर,धोलावीरा,प्रभाषपाटन,भगतराव,
हरियाणा  राखीगढ़ी, भिर्दाना, बनावली, कुणाल, मीताथल
पंजाब    रोपड़, बाड़ा
महाराष्ट्र   दायमाबाद
उत्तर प्रदेश    आलमगीरपुर, रावण उर्फ़ बडागांव,  अम्बखेडी
जम्मू कश्मीर   मांडा
राजस्थान   कालीबंगा

Monday, 12 December 2016

परमवीर चक्र के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

परमवीर चक्र के  बारे में संक्षिप्त जानकारी।

परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है। यह सेना के जवानों को उनकी बहादुरी के लिए दिया जाता है। इस सम्मान की शुरुआत 26 जनवरी 1950 में हुई थी। अब तक 21 सैनिकों को इससे सम्मानित किया गया है।
– सबसे ज्यादा सेना के 20 और एयरफ़ोर्स के एक जवान को ये अवॉर्ड मिला है।
– अभी तक नेवी के किसी जवान को यह अवॉर्ड नहीं मिला है।
– परमवीर चक्र पाने वाले सैनिकों या उनके परिजनों को 10 हजार रुपए महीने का अलाउंस भी दिया जाता है।
– परमवीर चक्र को सावित्री बाई खालोनकर ने डिजाइन किया था। उनकी मां हंगरी की, जबकि पिता रशियन थे।
– उनकी शादी मेजर जनरल विक्रम खालोनकर से हुई थी।
-सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत पहला परमवीर चक्र का सम्मान मिला।
पदक का प्रावधान
स्वतंत्र भारत में पराक्रमी वीरों को युद्ध भूमि में दिखाये गये शौर्य के लिए अनेक प्रतीक सम्मान पुरस्कारों का चलन शुरू हुआ। 15 अगस्त 1947 से वर्ष 1950 तक भारत अपना संविधान रचने में व्यस्त रहा। 26 जनवरी 1950 को जो विधान लागू हुआ, उसे 1947 से प्रभावी माना गया। वह इसलिए जिससे 1947-48 में हुए भारत-पाक युद्ध के वीरों को, जिन्होंने जम्मू- कश्मीर के मोर्चों पर अपना शौर्य दिखाया, उन्हें भी पुरस्कारों से सम्मानित किया जा सके। इस क्रम में युद्धभूमि में सैनिकों द्वारा दिखाए गये पराक्रम के लिए 1950 में तीन पुरस्कारों का प्रावधान किया गया, जो श्रेष्ठता के क्रम से इस प्रकार हैं-
परमवीर चक्र
महावीर चक्र
वीर चक्र
वर्ष 1952 में अशोक चक्र का प्रावधान किया गया।
शाब्दिक अर्थ
‘परमवीर चक्र’ का शाब्दिक अर्थ है “वीरता का चक्र”। संस्कृति के शब्द “परम”, “वीर” एवं “चक्र” से मिलकर यह शब्द बना है।यदि कोई परमवीर चक्र विजेता दोबारा शौर्य का परिचय देता है और उसे परमवीर चक्र के लिए चुना जाता है तो इस स्थिति में उसका पहला चक्र निरस्त करके उसे रिबैंड (Riband) दिया जाता है। ‘परमवीर चक्र’ को अमेरिका के ‘सम्मान पदक’ तथा ‘यूनाइटेड किंगडम’ के ‘विक्टोरिया क्रॉस’ के बराबर का दर्जा हासिल है। यह पुरस्कार वीर सैनिक को स्वयं या मरणोपरांत दिये जाने की स्थिति में, उसके प्रतिनिधि को सम्मानपूर्वक दिया जाता है। इस पुरस्कार को देश के तत्कालीन राष्ट्रपति विशिष्ट समारोह में अपने हाथों से प्रदान करते हैं। 1947 से लेकर आजतक यह पुरस्कार, चार बड़े युद्ध लड़े जाने के बाद भी केवल 21 सैनिकों को ही दिया गया है, जिनमें से 14 सैनिकों को यह पुरस्कार मरणोपरांत दिया गया है।
परमवीर चक्र का स्वरूप
भारतीय सेना के रणबांकुरों को असाधारण वीरता दर्शाने पर दिए जाने वाले सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र का डिज़ाइन विदेशी मूल की एक महिला ने किया था और 1950 से अब तक इसके आरंभिक स्वरूप में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं किया गया है

परमवीर चक्र विजेताओं के नाम

मेजर सोमनाथ शर्मा ,1947
लांस नायक करम सिंह , 1948
सेकेंड लेफ़्टीनेंट राम राघोबा राणे ,1948
नायक यदुनाथ सिंह,1948
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह,1948
कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया,1961
मेजर धनसिंह थापा,1962
सूबेदार जोगिंदर सिंह,1962
मेजर शैतान सिंह,1962
हवलदार अब्दुल हामिद, 1965
कर्नल आर्देशिर तारापोर,1965
लांस नायक अलबर्ट एक्का,1971
फ्लाईंग आफिसर निर्मलजीत सिंह सेखो,1971
लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल पूना हार्स,1971
मेजर होशियार सिंह,1971
नायब सूबेदार बन्ना सिंह,1987,
मेजर रामास्वामी परमेश्वर, 1987,
लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे,1999
ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव,1999
राइफलमैन संजय कुमार , 1999
कैप्टन विक्रम बत्रा,1999
अभी मात्र दो परमवीर चक्र विजेता जीवित है जिनमे योगेंद्र सिंह यादव और संजय कुमार जी है ।
जय हिंद ।

Tuesday, 29 November 2016

भारत का संविधान : भाग 12: वित्त, सम्‍पत्ति, संविदाएं और वाद, PART 12 FINANCE, PROPERTY, CONTRACTS AND SUITS

भारत का संविधान : भाग 12: वित्त, सम्‍पत्ति, संविदाएं और वाद, PART 12 FINANCE, PROPERTY, CONTRACTS AND SUITS

264.”वित्त आयोग” से अनुच्छेद 280 के अधीन गठित वित्त आयोग है।
265.कोई कर विधि के प्राधिकार से ही अधिरोपित या संगृहीत किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
266. अनुच्छेद 267 के उपबंधों के अधीन , ”भारत की संचित निधि” और ”राज्य की संचित निधि”  होगी  |
267(1). ”भारत की आकस्मिकता निधि” ,  अनुच्छेद 115 या अनुच्छेद 116 के अधीन संसद द्वारा,अग्रिम धन देने के लिए राष्ट्रपति को समर्थ बनाने के लिए उक्त निधि राष्ट्रपति के व्ययनाधीन रखी जाएगी।
267(2) राज्य का विधान-मंडल, विधि द्वारा,अनुच्छेद 205 या अनुच्छेद 206,जो ”राज्य की आकस्मिकता निधि” के नाम से ज्ञात होगी , अग्रिम धन देने के लिए राज्यपाल को समर्थ बनाने के लिए  व्ययनाधीन रखी जाएगी।

संघ और राज्यों के बीच राजस्वों का वितरण

268.ऐसे स्टांप-शुल्क तथा औषधीय और प्रसाधन निर्मितियों पर ऐसे उत्पाद-शुल्क, जो संघ सूची में वर्णित हैं, भारत सरकार द्वारा उद्‍ग्रहीत किए जाएँगे, किंतु (ख) अन्य दशाओं में जिन-जिन राज्यों के भीतर ऐसे शुल्क उद्ग्रहणीय हैं, उन-उन राज्यों द्वारा, संगृहीत किए जाएँगे।
268क. (1) सेवाओं पर कर भारत सरकार द्वारा लिया जायेगा ।
269. माल के क्रय या विक्रय पर कर और माल के ट्रांसमिशन पर कर, भारत सरकार द्वारा लिए  जाएँगे किन्तु राज्यों को सौंप दिए जाएँगे|
270.उद्‍गृहीत कर और उनका संघ तथा राज्यों के बीच वितरण
271. कुछ शुल्कों और करों पर संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार
272.संविधान (अस्सीवाँ संशोधन) अधिनियम, 2000 की धारा 4 द्वारा लोप किया गया।
273. जूट पर और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के स्थान पर अनुदान |
275. कुछ राज्यों को संघ से अनुदान|
276.वृत्तियों, व्यापारों, आजीविकाओं और नियोजनों पर कर|
278.संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा निरसित।
280.प्रत्येक पाँच वें वर्ष की समाप्ति पर या ऐसे पूर्वतर समय पर, जिसे राष्ट्रपति वित्त योग का गठन जो एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा।
285. संघ की संपत्ति को राज्य के कराधान से छूट।
286. राज्य की कोई विधि, माल के क्रय या विक्रय पर कोई कर अधिरोपित नहीं करेगी |
287. विद्युत पर करों से छूट
288. जल या विद्युत के संबंध में राज्यों द्वारा कराधान से कुछ दशाओं में छूट|
289. राज्यों की संपत्ति और आय को संघ के कराधान से छूट|
290. कुछ व्ययों और पेंशनों के संबंध में समायोजन|
290क. कुछ देवस्वम्‌ निधियों को वार्षिक संदाय
291. शासकों की निजी थैली (प्रिवी पर्स) की राशि को समाप्त | संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 की धारा 2 निरसित।
291(2) मद्रास राज्य (नाम परिवर्तन) अधिनियम, 1968 (1968 का 53) की धारा 4 द्वारा (14-1-1969 से) मद्रास के स्थान पर प्रतिस्थापित।
292. भारत सरकार द्वारा उधार लेना।
293. राज्यों द्वारा उधार लेना
297. राज्यक्षेत्रीय सागर-खंड या महाद्वीपीय मषनतट भूमि में स्थित मूल्यवान चीजों और अनन्य आर्थिक क्षेत्र के संपत्ति स्रोतों का संघ में निहित होना
298. संघ की और प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार, व्यापार या कारबार करने और किसी प्रयोजन के लिए संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन तथा संविदा करने पर
299. संविदाएँ–(1) संघ की या राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग करते हुए की गई सभी संविदाएँ, यथास्थिति, राष्ट्रपति द्वारा या उस राज्य के राज्यपाल द्द्वारा की जाती है |
300. भारत सरकार भारत संघ के नाम से वाद ला सकेगी ,और किसी राज्य की सरकार उस राज्य के नाम से वाद ला सकेगी

अध्याय 4 — संपत्ति का अधिकार

300क. किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार से ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

 

Wednesday, 23 November 2016

भारत का संविधान, भाग 11, संघ और राज्य के बीच सम्बन्ध, Constitution of India ,Part 11,RELATIONS BETWEEN THE UNION AND THE STATES


245. संसद भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगी और किसी राज्य का विधान-मंडल संपूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकेगा।
246. संसद द्वारा और राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा बनाई गई विधियों की विषय-वस्तु, संसद को सातवीं अनुसूची की सूची 1 में (जिसे इस संविधान में ”संघ सूची” कहा गया है) प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में विधि बनाने की अनन्य शक्ति है।किसी राज्य के विधान-मंडल को भी, सातवीं अनुसूची की सूची 3 में (जिसे इस संविधान में ”समवर्ती सूची” कहा गया है) प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में विधि बनाने की शक्ति है।किसी राज्य के विधान-मंडल को, सातवीं अनुसूची की सूची 2 में (जिसे इस संविधान में ”राज्य सूची” कहा गया है) प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में उस राज्य या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की अनन्य शक्ति है। संसद को भारत के राज्यक्षेत्र के ऐसे भाग के लिए 2[जो किसी राज्य] के अंतर्गत नहीं है, किसी भी विषय के संबंध में विधि बनाने की शक्ति है, चाहे वह विषय राज्य सूची में प्रगणित विषय ही क्यों न हो।
247. कुछ अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना का उपबंध करने की संसद की शक्ति
248. संसद को किसी ऐसे विषय के संबंध में, जो समवर्ती सूची या राज्य सूची में प्रगणित नहीं है, विधि बनाने की अनन्य शक्ति है।
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Tuesday, 22 November 2016

दुनिया का सबसे पतला लैपटॉप भारत में लॉन्च

दुनिया का सबसे पतला लैपटॉप भारत में लॉन्च

ताइवान की टेक कंपनी Acer ने भारत में Swift 7 लैपटॉप लॉन्च कर दिया है. कंपनी का दावा है कि यह दुनिया का सबसे पतला लैपटॉप है जो 1cm से भी पतला है. इसे सबसे पहले इसकी साल बर्लिन के IFA में पेश किया गया था. इसकी बिक्री 18 नवंबर से सिर्फ ई-कॉमर्स वेबसाइट फ्लिपकार्ट पर होगी. इसकी कीमत 1 लाख रुपये है.
Swift 7 सिर्फ 0.39 इंच पतला है और इसका वजन लगभग 1.1 किलोग्राम है. इसमेमं 13.3 इंच की फुल एचडी आईपीएस डिस्प्ले दी गई है जिसका रिजोलुशन 1920X1080p है. इसकी स्क्रीन पर गोरिल्ला ग्लास 5 का प्रोटेक्शन दी गई है ताकि स्क्रैच न लगे.
हार्डवेयर की बात करें तो इसमें 7th जेनेरेशन Intel i5 प्रोसेसर दिया गया है जिसकी स्पीड 1.20GHz है. इसमें 8GB रैम और 256GB SSD दी गई है जो आम हार्ड डिस्क से काफी फास्ट होती है.
बेहतरीन ऑडियो क्वॉलिटी के लिए इसमें डॉल्बी ऑडियो और ऐसर ट्रू हार्मनी टेक्नॉलोजी दी गई है. इसमें दो यूएसबी टाइप सी पोर्ट्स हैं जो 3 गुना ज्यादा वायरलेस परफॉर्मेंस देंगे. कंपनी के मुताबिक इसे एक बार फुल चार्ज करके 9 घंटे तक चलाया जा सकता है.
ऐसर इंडिया के कंज्यूमर बिजनेस हेड चंद्रहास पाणिग्रही ने कहा है, ‘हम भारत में Swift लॉन्च करके काफी उत्साहित हैं. यह दुनिया का सबसे लैपटॉप है जिसमें पावरफुल परफॉर्मेंस और प्रीमियम डिजाइन दिया गया है. पिछले कुछ क्वॉर्ट्स से हम नई टेक्नॉलोजी से लैस अपने प्रोडक्ट पोर्टफोलियो पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे’
Courtesy : aajtak

भाग 9क : नगर पालिकाएं : Part 9A MUNICIPALITIES

भाग 9क : नगर पालिकाएं : Part 9A MUNICIPALITIES

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भाग 9क : नगर पालिकाएं : Part 9A  MUNICIPALITIES

243थ.(1) प्रत्येक राज्य में, इस भाग के उपबंधों के अनुसार,ग्रामीण क्षेत्र से नगरीय क्षेत्र में संक्रमणगत क्षेत्र के लिए कोई नगर पंचायत का ,(ख) किसी  घुतर नगरीय क्षेत्र के लिए नगरपालिका परिषद् का ,(ग) किसी वृहत्तर नगरीय क्षेत्र के लिए नगर निगम का, गठन किया जाएगा
243न. स्थानों का आरक्षण
243प. नगरपालिकाओं की अवधि नियत तारीख से पांच वर्ष तक बनी रहेगी,
243फ. सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
243ब(क) स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हों
243भ. नगरपालिकाओं द्वारा कर अधिरोपित करने की शक्ति और उनकी निधियाँ
243म. अनुच्छेद 243झ के अधीन गठित वित्त आयोग नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति का भी पुनर्विलोकन करेगा
243य. नगरपालिकाओं के लेखाओं की संपरीक्षा–किसी राज्य का विधान-मंडल, विधि द्वारा, नगरपालिकाओं द्वारा लेखे रखे जाने और ऐसे लेखाओं की संपरीक्षा करने के बारे में उपबंध कर सकेगा।
243यक. नगरपालिकाओं के लिए निर्वाचन, अनुच्छेद 243 में निर्दिष्ट राज्य निर्वाचन आयोग में निहित होगा
243यघ. जिला योजना के लिए समिति
243यङ. महानगर योजना के लिए समिति
243यछ. निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन

भाग 9 : पंचायतीराज : Part 9 PANCHAYAT


भाग 9 : पंचायतीराज  : Part 9 PANCHAYAT

243. परिभाषाएँ।
243A. ग्राम सभा
243B. पंचायतों का गठन।
243C. पंचायतों की संरचना है।
243D. सीटों का रिजर्वेशन।
243E. पंचायतों आदि की अवधि
243F. सदस्यता के लिए निरर्हताएं।
243G. शक्तियों अधिकार और पंचायतों की जिम्मेदारियों।
243H. शक्तियों द्वारा करों, और फंड, पंचायतों लागू करने के लिए।
243I.वित्त आयोग के संविधान वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने के लिए।
243J. पंचायतों के खातों की लेखा परीक्षा।
243K. पंचायतों के चुनाव।
243L. केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आवेदन।
243M. भाग कुछ क्षेत्रों के लिए लागू करने के लिए नहीं।
243N. मौजूदा कानूनों और पंचायतों का बना रहना।
243O. चुनावी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप करने के लिए बार।

Vice Presidents of India, भारत के उपराष्ट्रपति

Vice Presidents of India, भारत के उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति, राज्य सभा का पदेन सभापति होगा और अन्य कोई लाभ का पद धारण नहीं करेगा। राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति के दौरान या उसकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन |उपराष्ट्रपति को उस अवधि के दौरान और उस अवधि के संबंध में, जब वह राष्ट्रपति के रूप में इस प्रकार कार्य कर रहा है या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है, राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ और उन्मुक्तियाँ होंगी तथा वह ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का जो संसद, विधि द्वारा, अवधारित करे और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है तब तक ऐसी उपलब्धियों, भत्तों और विशेषाधिकारों का, जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं, हकदार होगा।

भारत के उपराष्ट्रपतियों की सूची

1 .सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1888–1975) ,मई 13 1952- मई 12, 1962 तक रहे | दोनों बार निर्विरोध ( १९५२ , १९५७ ) चुने गए | 
2..जाकिर हुसैन (1897–1969),मई 13 1962 – मई 12 1967 तक रहे | १९६२ के चुनाव में | 
3.वी वी गिरी (1894–1980), १९६७ के चुनाव में | मई 13, 1967 से मई 3, 1969 तक रहे  , राष्ट्रपति के चुनाव के लिए त्यागपत्र दे दिया |      
4.गोपाल स्वरूप पाठक (1896–1982),१९६९ क्व चुनाव में , अगस्त 31, 1969 से अगस्त 30,1974  तक रहे|
5.बी डी जत्ती(1912–2002),१९७४ के चुनाव में जीते | अगस्त 31 1974 से अगस्त 30,1979 | , १९७७ में कार्यवाहक राष्ट्रपति नियुक्त किये गए |
6.मोहम्मद हिदायतुल्ला(1905–1992),१९७९ के चुनाव में जीते | अगस्त 31, 1979 से अगस्त 30, 1984 तक रहे | निर्विरोध चुने गए | १९८२ में कार्यवाहक राष्ट्रपति रहे |
7.रामस्वामी वेंकटरमण (1910–2009)    , १९८४ के चुनाव में जीते ,अगस्त 31, 1984 से  जुलाई 27, 1987 तक रहे |     १९८७ में राष्ट्रपति  चुन लिए गए 
8.शंकर दयाल शर्मा (1918–1999), १९८७  के चुनाव में निर्विरोध , सितम्बर 3, 1987 से जुलाई 24, 1992  तक रहे 
9.के आर नारायणन (1920–2005), १९९२ के चुनाव      ,अगस्त 21, 1992 से जुलाई 24, 1997 तक रहे | राष्ट्रपति चुने गए |
10.कृष्णकांत (1927–2002) , १९९७ क्व चुनाव में जीते, एक स्वतंत्र संग्राम सेनानी दंपत्ति से जेल में जन्म हुआ| इनकी मृत्यु कार्यकाल में हो गयी | अगस्त 21, 1997 से जुलाई 27, 2002 तक रहे |
11.भैरो सिंह शेखावत (1923–2010) , १९९२ के चुनाव में जीते | राजस्थान के 3 बार मुख्यमंत्री रहे | अगस्त 19, 2002 से जुलाई 21, 2007 तक रहे |
12.हामिद अंसारी (born in 1937), २००७, २०१२ के चुनाव में जीते | भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी |     अगस्त 11, 2007 से वर्तमान

भाग 8: संघ राज्‍य क्षेत्र : Part 8

Constitution of India Part 8 , The Union Territories, भाग 8: संघ राज्‍य क्षेत्र



भाग 8: संघ राज्‍य क्षेत्र : Part 8


239(1) प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा।
239(2) राष्ट्रपति किसी राज्य के राज्यपाल को किसी निकटवर्ती संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक नियुक्त कर सकेगा
239क. कुछ संघ राज्यक्षेत्रों के लिए स्थानीय विधान-मंडलों या मंत्रि-परिषदों का या दोनों का सृजन (संविधान (चौदहवाँ संशोधन) अधिनियम, 1962)
239(क)(क). संविधान (उनहत्तरवाँ संशोधन) अधिनियम, 1991 के प्रारंभ से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र को दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र  तथा उसके प्रशासक का पदाभिधान उप-राज्यपाल होगा।
परंतु उप-राज्यपाल और उसके मंत्रियों .... more at 

भारत का संविधान – भाग 6- राज्य , Constitution of India, Part 6 State

भारत का संविधान – भाग 6- राज्य , Constitution of India, Part 6 State


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भाग 6 , राज्य , Part 6 State 

152. परिभाषा– इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, ” राज्य”  (जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर)

राज्यपाल

153.प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा
154. राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा।
155. राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त करेगा।
156.  राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा।
157. कोई व्यक्ति राज्यपाल नियुक्त होने का पात्र तभी होगा जब वह भारत का नागरिक है और पैंतीस वर्ष की आयु पूरी कर चुका है।159. राज्यपाल द्वारा शपथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति या उसकी अनुपस्थिति में उस न्यायालय के उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश के समक्ष करेगा
161. किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी, जिस विषय पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश में निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति होगी।

मंत्रि-परिषद

163. राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद होगी जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा।
163(3) इस प्रश्न की किसी न्यायालय में जाँच नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राज्यपाल को काई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी।
164 मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत अपने पद धारण करेंगे|
164(क) किसी राज्य की मंत्रि-परिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या केपंद्रह प्रतिशत से अधिक नहीं होगी|परंतु किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या बारह से कम नहीं होगी :
164(2) मंत्रि-परिषद राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी।

राज्य का महाधिवक्ता

165(1) प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा।
165(2) महाधिवक्ता का यह कर्तव्य होगा कि वह उस राज्य की सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे
165(3) महाधिवक्ता, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा और ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे
सरकारी कार्य का संचालन
166. किसी राज्य की सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से की हुई कही जाएगी।
167.प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री का यह कर्तव्य होगा कि वह राज्यपाल को , राजपाल द्वारा मांगे गए सूचना दे |
साधारण168 (1) प्रत्येक राज्य के लिए एक विधान-मंडल होगा जो राज्यपाल (2) किसी राज्य के विधान-मंडल के दो सदन हैं वहां एक का नाम विधान परिषद और दूसरे का नाम विधानसभा होगा और केवल एक सदन है वहां उसका नाम विधानसभा होगा।
170. विधानसभाओं की संरचना,प्रत्येक राज्य की विधानसभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए पाँच सौ से अनधिक और साठ से अन्यून सदस्यों से मिलकर बनेगी।
172.प्रत्येक राज्य की प्रत्येक विधानसभा, यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है तो, अपने प्रथम अधिवेशन  के लिए नियत तारीख से पाँच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं और पाँच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम विधानसभा का विघटन होगा:|
173. राज्य के विधान-मंडल की सदस्यता के लिए अर्हता(क) वह भारत का नागरिक है (ख)  कम से कम पच्चीस वर्ष की आयु का और विधान परिषद के  लिए कम से कम तीस वर्ष की आयु का|
174. राज्यपाल, समय-समय पर, राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन को, अधिवेशन  के लिए आहूत करेगा
174(2) राज्यपाल (क) सदन का या किसी सदन का सत्रावसान कर सकेगा(ख) विधानसभा का विघटन कर सकेगा।
176(1) राज्यपाल, विधानसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात्‌ प्रथम सत्र के आरंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ मेंट विधानसभा में या विधान परिषद वाले राज्य की दशा में एक साथ समवेत दोनों सदनों में अभिभाषण करेगा
177.प्रत्येक मंत्री और राज्य के महाधिवक्ता को यह अधिकार होगा कि वह उस राज्य की विधानसभा में या विधान परिषद वाले राज्य की दशा में दोनों सदनों में बोले और उनकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले|

राज्य के विधान-मंडल के अधिकारी

178. विधानसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
179. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना
181. जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना
182.विधान परिषद वाले प्रत्येक राज्य की विधान परिषद, यथाशीघ्र, अपने दो सदस्यों को अपना सभापति और उपसभापति चुनेगी
183. सभापति और उपसभापति का पद रिक्त होना
211.उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के अपने कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए, आचरण के विषय में राज्य के विधान-मंडल में कोई चर्चा नहीं होगी।
212. न्यायालयों द्वारा विधान-मंडल की कार्यवाहियों की जाँच न किया जाना
213. विधान-मंडल के विश्रांतिकाल में अध्यादेश प्रख्यापित करने की राज्यपाल की शक्ति,परंतु राज्यपाल, राष्ट्रपति के अनुदेशों के बिना, कोई अध्यादेश प्रख्यापित नहीं करेगा
214. प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा।
215. उच्च न्यायालयों का अभिलेख न्यायालय होना
216. प्रत्येक उच्च न्यायालय मुख्‍य न्यायमूर्ति और ऐसे अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।
217.भारत के मुख्‍य न्यायमूर्ति से, उस राज्य के राज्यपाल से और मुख्‍य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में उस उच्च न्यायालय के मुख्‍य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्‌, राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा
220. स्थायी न्यायाधीश रहने के पश्चात्‌ विधि-व्यवसाय पर निर्बंधन
221. न्यायाधीशों के वेतन आदि
222. किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को अंतरण
223. कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति की नियुक्ति224. अपर और कार्यकारी न्यायाधीशों की नियुक्ति |
224क. उच्च न्यायालयों की बैठकों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति-
227. सभी न्यायालयों के अधीक्षण की उच्च न्यायालय की शक्ति |
228. कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण–यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि उसके अधीनस्थ किसी न्यायालय में लंबित किसी मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान्‌ प्रश्न अंतर्वलित है जिसका अवधारण मामले के निपटारे के लिए आवश्यक है तो वह उस मामले को अपने पास मंगा लेगा
229. उच्च न्यायालयों के अधिकारी और सेवक तथा व्यय तथा नियुक्तियाँ उस न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति करेगा
231. दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय की स्थापना
233. जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
234. न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती,  राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्ति उस राज्य के राज्यपाल द्वारा, राज्य लोक सेवा आयोग से और ऐसे राज्य के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय से परामर्श करने के पश्चात्‌‌, और राज्यपाल द्वारा इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार की जाएगी।
235.जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों का नियंत्रण
237. राज्यपाल, लोक अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगा कि इस अध्याय के पूर्वगामी उपबंध और उनके अधीन बनाए गए नियम ऐसी तारीख से, जो वह इस निमित्त नियत करे, ऐसे अपवादों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए,  जो ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएँ, राज्य में किसी वर्ग या वर्गों के मजिस्ट्रेटों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे राज्य की न्यायिक सेवा में नियुक्त व्यक्तियों के संबंध में लागू होते हैं।

Daily Top 10 Headlines in Hindi & English : 11 Oct 2018

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